बाजार में नकली खाद का जाल, किसान का संकट और सत्ता में सन्नाटा
यह लेख नकली खाद और कीटनाशकों के बढ़ते संकट को उजागर करता है, जिससे किसानों की फसल, जीवन और भरोसा बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। यह केवल कृषि नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और राष्ट्र की चेतना का मुद्दा है, जिस पर तत्काल और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
बीज तो बोया था अमृतमय अन्न का, बोरी वाली खाद डाली थी बढ़िया सरकारी सील-ठप्पे वाली, पर फसल से निकला ऐसा कुछ कि न पेट भरा, ना जेब। फटी जेब की सिलाई भी नहीं हो पाई और खेत की जमीन भी बंजर हो गई। जिस धरती को 'भारत माता' कहा जाता है, उसी की कोख में आज बेहिसाब ज़हर डाला जा रहा है, कभी यूरिया के नाम पर, कभी डीएपी की थैली में, और कभी सूक्ष्म पोषक तत्वों की आड़ में ज़हर अब खेतों में नहीं, नीति में मिलाया जा रहा है। जब मिट्टी कराहती है, तो सत्ता मौन साध लेती है। यह केवल खेती की त्रासदी नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता के मूल स्तंभ, किसान की सुनियोजित उपेक्षा है।
देश के विभिन्न हिस्सों में नकली खाद, कीटनाशक और उर्वरक अब सामान्य से मुद्दे नहीं रहे, यह एक संगठित आपदा का रूप ले चुके हैं। छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में खाद की हर बोरी अब किसान के लिए एक अनिश्चित दांव बन गई है। फसल बचेगी या जलेगी, यह अब उर्वरक और बीज निर्माता तय करते हैं। और जो खाद खेतों को जीवन देना चाहती थी, वही अब जड़ों को मुरझा रही है।
यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक अपराध है। भारतीय कृषि केवल उपज नहीं, बल्कि एक परंपरा है। हमारे उपनिषदों में अन्न को 'ब्रह्म' कहा गया “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्” (तैत्तिरीयोपनिषद्). जब हम किसान को नकली खाद देते हैं, तो हम केवल उसकी फसल को नहीं, उसकी आस्था और श्रम को अपमानित करते हैं।
हर बार जब एक किसान नकली खाद डालता है, तो केवल फसल नहीं जलती,, उसकी बेटी की पढ़ाई, उसके पिता की दवा और उसकी उम्मीदों की लौ भी बुझ जाती है। और यह सब होता है तब, जब प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना में 6000 रुपए की वार्षिक सहायता को "महान अंतिम समाधान" की तरह प्रचारित किया जाता है। सवाल यह नहीं कि सहायता दी जा रही है, सवाल यह है कि क्या 6000 रुपए से इस बर्बादी की भरपाई हो सकती है?
अब समय आ गया है कि सरकार खाद पर केवल चमकदार पैकिंग और विज्ञापनों से नहीं, ज़मीन पर सख़्त निगरानी व्यवस्था से जवाब दे। हर खाद की बोरी पर QR कोड अनिवार्य हो, जिससे उसकी ट्रेसबिलिटी बनी रहे। ब्लैकलिस्टेड कंपनियों को नाम बदलकर फिर से व्यापार करने से रोकने के लिए कानूनी रोक लगे। हर जिले में खाद परीक्षण के लिए स्वतंत्र उड़नदस्ते हों।
नकली खाद से जुड़े मामलों के लिए फास्ट ट्रैक न्यायाधिकरण गठित हों , जिनमें किसानों की भी सहभागिता सुनिश्चित हो, जिसमें कम से कम 10 साल की सज़ा और न्यूनतम 50 लाख रुपए तक का जुर्माना अनिवार्य किया जाए। यह भी आवश्यक है कि किसानों को प्रमाणित खाद की पहचान के लिए प्रशिक्षित किया जाए, ताकि वह पैकिंग से नहीं, गुणवत्ता से पहचाने। हमें "पैकेट चमके, चाहे खेत झुलसे" वाली व्यवस्था को बदलना होगा।
भारत की आत्मनिर्भरता का पहला आधार किसान का आत्मविश्वास है। जब तक किसान को सच्चा बीज, असली खाद और ईमानदार व्यवस्था नहीं मिलेगी, तब तक आत्मनिर्भरता केवल नारे में सिमटी रहेगी। यह विषय अब केवल कृषि का नहीं, राष्ट्र की चेतना का है। सरकार, समाज और वैज्ञानिक तंत्र को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत की धरती माता केवल नक्शे में उपजाऊ न कहलाए वह हकीकत में शाश्वत अन्नपूर्णा बनी रहे।
डॉ. राजाराम त्रिपाठी,
(ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ तथा अखिल भारतीय किसान महासंघ 'आईफा' के राष्ट्रीय संयोजक)
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